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Showing posts from November, 2020

Paper- 3036, Unit- 1, लोंजाइनस

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  लोंजाइनस औदात्य सिध्दान्त के प्रतिष्ठापक लोंजाइनस माने जाते हैं । लोंजाइनस का असली नाम ज्ञात नहीं है। वह   यूनानी   काव्यालोचन   का शिक्षक था। उसका काल पहली से लेकर तीसरी शदी तक होने का अनुमान है। लोंजाइनस के ग्रन्थ ‘ पे री हु प्सुस ’ (Peri Hupsous)की खोज 16 वीं शताब्दी में हो सकी और इसका प्रथम संस्करण 1554 ई में प्रकाशित हो सका,जो अभी अपूर्ण माना जाता है। इस ‘ पे री हु प्सुस ’ में जिसका अंग्रेजी अनुवाद ‘दि सब्लाइम’(The Sublime) किया गया है, जिसका तात्पर्य है- ‘ ऊँचाई पर ले जाना ’ या ‘ ऊपर उठाना ’, औदात्य सिध्दान्त की प्रतिष्ठा की गयी है। लोंजाइनस ने औदात्य की प्रेरणा कैसिलियस (Caecilius) के निबन्ध उदत्त से ली थी।   लोंजाइनस   ने   काव्य   को श्रेष्ठ बनाने वाले तत्वों पर विचार करते हुए इस सिद्धांत का प्रतिपादन किया है। वे उदात्त को काव्य को श्रेष्ठ बनाने वाला तथा कवि को प्रतिष्ठा दिलाने वाला तत्व मानते हैं। यह उदात्त महान विचारों संगठित अलंकार योजना , अभिजात्य पद रचना तथा प्रभाव की गरिमा में निहित है। वे वागाडंबर और भावाडंबर को उदाद्त्ता मे...

Paper- 3036, Unit- 1 अरस्तू

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    भूमिका   अरस्तू  (384  ईपू   – 322  ईपू )  यूनानी   दार्शनिक   थे। अरस्तू ( Aristotiles)  का जन्म मकदूनिया के स्तगिरा नामक नगर में हुआ था। उनके पिता सिकंदर के पितामह के दरबार में चिकित्सक थे। उन्हें सिकंदर महान का गुरू होने का भी गौरव प्राप्त है। ज्ञान-विज्ञान के लगभग सभी क्षेत्रों पर उनका समान अधिकार था।   अरस्तू ने  भौतिकी ,  आध्यात्म ,  कविता ,  नाटक ,  संगीत ,  तर्कशास्त्र ,  राजनीति शास्त्र ,  नीतिशास्त्र ,  जीव विज्ञान   सहित कई विषयों पर रचना की। अरस्तू ने अपने गुरु प्लेटो के कार्य को आगे बढ़ाया।  उनकी कृतियों की संख्या  400  मानी गई है ,  किन्तु उनकी प्रतिष्ठा के लिए दो ही ग्रंथ उपलब्ध है-  ' तेख़नेस रितेरिकेस '  जो भाषण कला से सम्बन्धित है। इसका अनुवाद  ' भाषण कला ' (Rhetoric)  किया गया ,  दूसरा  ' पेरिपोइतिकेस '  जो काव्यशास्त्र से सम्बन्धित है। जिसका अनुवाद  ' काव्यशास्त्र ' (poetics)  किया गया हालां...