अभिव्यंजना का स्वरूप क्रोचे के अभिव्यंजनावाद की प्रमुख बातें निम्नांकित बिन्दुओं द्वारा समझी जा सकती हैं- (1) अभिव्यंजनावाद का सम्बन्ध सहज ज्ञान या कलात्मक ज्ञान से है। (2) अभिव्यंजनावाद का सम्बन्ध बाह्य जगत् से बिल्कुल नहीं है। (3) काव्य में अभिव्यंजनावाद ही सब कुछ है। क्रोचे की दृष्टि में अभिव्यंग्य का मूल्य कुछ भी सूक्ष्म रूप से अभिव्यक्ति कलाकार के मन में होती है। बाद में आश्रय-भेद से उसको अभिव्यक्ति मिलती है। (4) कवि की सौंदर्य भावना का गत्यात्मक रूप ही अभिव्यंजनावाद में आता है। इसकी सूक्ष्म रूप से अभिव्यक्ति कलाकार के मन में होती है। बाद में आश्रय-भेद से उसको अभिव्यक्ति मिलती है। (5) सहज ज्ञान स्वयं प्रतिच्छविरूप है। यह प्रतिच्छवि अन्तर्जगत् से ही सम्बन्धित है। (6) अभिव्यंजना अपने आप में पूर्ण है। किसी भी प्रकार के बाह्य उद्देश्य से उसका कोई प्रयोजन नहीं दिखाई पङता है। (7) कला आध्यात्मिक क्रिया है और अभिव्यंजना उसी का दूसरा नाम है। कला का मूर्त रूप अभिव्यंजना है। (8) अभिव्यंजनावाद में जो प्रक्रिया काम करती है , उसके स्तर हैं- संवेदना , सहजानुभूति , आन...