यथार्थवाद
यथार्थवाद
स्वरूप
यथार्थवाद अंग्रेजी शब्द 'Realism' का हिंदी रूपांतरण है। Realism दो शब्दों से
मिलकर बना है Real+ism
। Real शब्द की उत्पत्ति ग्रीक भाषा के शब्द से मानी जाती है जिसका
अर्थ 'वस्तु' तथा ism का अर्थ- वाद। इस प्रकार Realism का शाब्दिक
अर्थ है वस्तुवाद अथवा वस्तु के अस्तित्व के संबंध में विचारधारा । अतः यथार्थवाद
वस्तु के अस्तित्व को स्वीकार करता है और वस्तु की वास्तविकता पर बल देता है । यह
विचारधारा भौतिकवाद पर आधारित है । भौतिकवाद के अनुसार केवल भौतिक जगत ही सत्य है
इस प्रकार यथार्थवाद का सिद्धांत है, जो जगत को उसी रूप में स्वीकार करता है जिस
रूप में वह दिखाई पड़ता है या अनुभूति किया जाता है।
यथार्थवाद एक ऐसी विचारधारा है जिसका
बीजारोपण मानव मस्तिष्क में अति प्राचीन काल में ही हो गया था, किन्तु जहाँ तक यथार्थवाद के वैज्ञानिक स्वरूप का प्रश्न है हम
यह कह सकते हैं कि जिस यथार्थवादी विचारधारा का बहुत पहले मानव मस्तिष्क में अचेतन
रूप से बीजारोपण हो गया था, उसका सूत्रपात १६वीं शताब्दी के अन्त में हुआ जो १७वीं शताब्दी
तक पहुँचते पहुँचते एकदम स्पष्ट हो गया।
यथार्थवाद के प्रादुर्भाव के दो
प्रमुख कारण थे- प्रथम, प्राचीनकाल से चली आने वाली आदर्शवादी
विचारधारा का १६वीं शताब्दी तक आडम्बरपूर्ण एवं खोखला हो जाना तथा द्वितीय, विज्ञान का विकास। पुनरूत्थान काल के
इस युग में मनुष्य में एक ऐसी लहर उत्पन्न हो गयी कि परलोक के बजाय मानवीय गुणों
का विकास करना मानव जाति का प्रधान लक्ष्य हो गया। इसके परिणामस्वरूप 'मानवतावाद' का प्रादुर्भाव हुआ । इसके उपरान्त –'सुधारकाल' का जन्म हुआ। मानवतावाद एवं सुधारवाद
के परिणामस्वरूप मनुष्य ‘बुद्धि’ एवं ‘विवेक’ पर आस्था रखने लगा और इनके आधार पर
सभी वस्तुओं को समझने का प्रयास करने लगा। कोपरनिकस, गैलीलियो, न्यूटन, जॉन केपलर, हारवीज, बेकन इत्यादि के शोधों के फलस्वरूप
मानव दृष्टिकोण की संकीर्णता एवं अन्ध विश्वास नष्ट हो गये। वैज्ञानिक युग का
आरम्भ हुआ और इस युग ने ‘बुद्धि’ एवं विवेक’ को अधिक प्रधानता दी तथा मनुष्य का
ध्यान वास्तविकता की ओर आकृष्ट किया। इस प्रकार भौतिक दार्शनिकता एवं वैज्ञानिक
प्रवृत्ति के समावेश से यथार्थवाद का जन्म हुआ जो परलोक की सत्ता को अस्वीकार करता
है।
जेम्स एस. रॉस के अनुसार–
यथार्थवाद का सिद्धांत स्वीकार
करता है कि हमारे प्रत्यक्षीकरण के उद्देश्य के पीछे और उनसे मिलता-जुलता वस्तुओं
का एक वास्तविक संसार है्।
ब्राउन के अनुसार–
यथार्थवाद का मुख्य विचार यह है,
कि सब भौतिक वस्तुएं या बाह्य जगत के पदार्थ वास्तविक हैं और उनका अस्तित्व देखने
वाले से प्रथक है यदि उनको देखने वाले व्यक्ति न हो, तो भी उसका उनका अस्तित्व होगा
और वे वास्तविक होंगे।
बटलर के अनुसार–
यथार्थवाद विश्व की अपनी सामान्य
स्वीकृति का पुनर्बलन है जिस रूप में वह हमें हमारे समक्ष होता ह।
स्वामी रामतीर्थ के अनुसार–
यथार्थवाद का अर्थ वह विश्वास या
सिद्धांत है जो जगत को वैसे ही स्वीकार करता है जैसा कि हमें दिखाई देता है
यथार्थवाद के महत्व
1.आंगिक महत्व– यथार्थवाद व्यवस्था है जो सदैव आंगिक ह। इसका प्रत्येक भाग स्वयं एक सक्रिय व्यवस्था है एक समन्वित प्रक्रिया ह। यह केवल परिणाम नहीं है वरन स्वयं कारण भी ह। संसार विकास की प्रक्रिया में एक तरंगित अवयव है परिवर्तन इस तरंगित विश्व का आधारभूत गुण ह। सत्य, वास्तविकता की सार तत्व प्रक्रिया ह। मन को अवयवी के कार्य के रूप में स्वीकार किया जाना चाहि।
2.मानव के वर्तमान व व्यवहारिक जीवन पर बल – यथार्थवादी उन आदर्शों, नियमों एवं मूल्यों को कोई महत्व नहीं देते हैं जिनका संबंध वर्तमान एवं व्यवहारिकता से नहीं ह। इसके साथ ही वे बौद्धिकता तथा आदर्शवादियों का विरोध करते है।
3.यथार्थवाद, पारलौकिकता को अस्वीकार करता है – यथार्थवाद प्रत्यक्ष जगत को ही सब कुछ मानता ह। इसके अनुसार इस लोक से परे कोई वस्तु नहीं है इस प्रकार यह वैज्ञानिक दृष्टिकोण एवं वस्तुनिष्ठता पर बल देता ह। वस्तुतः यथार्थवाद अपनी प्रक्रिया में वैज्ञानिक ह।
4.वस्तु जगत में नियमितता – यथार्थवादी भौतिक जगत की नियमितता को आधार मानते है। उनका मानना है कि भौतिक जगत में जो कुछ भी परिवर्तन होते हैं उनमें सतत नियमितता पाई जाती ह। अतः यही नियमितता मानव के अनुभव एवं ज्ञान प्राप्ति में होनी चाहिए तभी यथार्थ ज्ञान हो सकता है ।
5.इंद्रिय ज्ञान की यथार्थता – यथार्थवाद का अन्य एक महत्व इंद्रिय ज्ञान की यथार्थता है । उनका विचार है कि वास्तविक ज्ञान की प्राप्ति केवल इंद्रियों के माध्यम से ही होती है । क्योंकि इंद्रियां संवेदनशील होती हैं ।
6.दृश्य जगत की यथार्थता – यथार्थवाद का प्रमुख महत्व दृश्य जगत की यथार्थता है क्योंकि वह दृश्य जगत को ही सत्य प्रदार्थ मानते हैं । उनके विचार में इस संसार में हम जो कुछ भी देखते हैं सुनते हैं अथवा अनुभव प्राप्त करते हैं वही सत्य है अर्थात जो प्रत्यक्ष है वही उसी का अस्तित्व है ।
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