शैलीविज्ञान

 

शैलीविज्ञान का स्वरूप

शैली का तात्पर्य संस्कृत शब्द शील से है। पाश्चात्य विचारकों के अनुसार, शैली STYLE का पर्याय है, जो लैटिन भाषा स्टाइलस से निर्मित, जिसका अर्थ- कलम, लेखनी है। अतः स्टाइल का अर्थ लिखने का ढंग, लेखक की अभिव्यक्ति की विशेषता, रचना पद्धति से है। शैलीविज्ञान (stylistics) शब्द दो शब्दो से मिलकर बना है- शैली और विज्ञान, जिसका शाब्दिक अर्थ है 'शैली का विज्ञान' अर्थात‌‌‌‌ जिस विज्ञान में शैली का वैज्ञानिक एवं व्यवस्थित रूप सें अध्ययन किया जाए वह शैलीविज्ञान है। शैलीशब्द अंग्रेजी के स्टाइल (Style) शब्द का हिन्दी रूपान्तर है। उसी प्रकार 'शैलीविज्ञान' अंग्रेजी के स्टाइलिस्टिक्स (Stylistics) है। शैलीविज्ञान समीक्षा का नवीन आयाम है जो साहित्य का अध्ययन भाषा विज्ञान के सिद्धांत और प्रविधि के आधार पर करता है । डा० रवींद्र नाथ श्रीवास्तव के मत में--शैलीविज्ञान साहित्यिक आलोचना का सिद्धांत भी है और प्रणाली भी। शैलीविज्ञान भाषाविज्ञान एवं साहित्यशास्त्र दोनों की सहायता लेता हुआ भी दोनों से अलग स्वतंत्र विज्ञान है। शैलीविज्ञान एक ओर भाषाशैली का अध्ययन साहित्यशास्त्र के सिद्धांतों के आधार पर करता है, जिसमें रस, अलंकार, वक्रोक्ति, ध्वनि, रीति, वृत्ति, प्रवृत्ति, शब्द-शक्ति, गुण, दोष, बिंब, प्रतीक आदि आते हैं। दूसरी ओर शैलीविज्ञान के अंतर्गत भाषा-शैली का अध्ययन भाषाविज्ञान के सिद्धांतों के आधार पर किया जाता है, जिसमें भाषा की प्रकृति और संरचना के अनुशीलन को महत्त्व दिया जाता है।

शैलीविज्ञान के अध्ययन की मुख्यत: दो दिशाएँ प्रचलित है:

·         साहित्यशास्त्र के आधार पर

·         भाषाविज्ञान के आधार पर

साहित्यशास्त्र के आधार पर किसी कवि, लेखक, कृति का शैलीवैज्ञानिक अध्ययन किया जाता है अर्थात रस, अलंकार, वक्रोक्ति, रीति, ध्वनि, गुण, दोष, वृत्ति, प्रवृत्ति, बिंब, छंद आदि के आधार पर देखा जाता है कि लेखक या कवि ने साहित्यशास्त्र के सिद्धांतों का अनुसरण उचित रूप में कहाँ तक किया है ।

भाषाविज्ञान के आधार पर किसी कवि या लेखक की रचना में प्रयुक्त भाषा की प्रकृति और संरचना के तत्त्वों का वैज्ञानिक विश्लेषण करते हैं। प्रकृति और संरचना के आधार पर भाषा के पाँच तत्त्व माने जाते हैं- ध्वनि, शब्द, रूप, वाक्य और अर्थ। इसके आधार पर देखा जाता है कि कवि की भाषा में कहाँ ध्वनि-विचलन, ध्वनि-चयन, ध्वनि-समानान्तर का प्रयोग हुआ, कहाँ शब्द-विचलन, शब्द-चयन, शब्द-समानान्तर किया गया। इसी प्रकार रूप-स्तर, वाक्य-स्तर तथा अर्थ-स्तर पर भी अध्ययन किया जाता है। वाक्यों के अंतर्गत मुहावरे एवं लोकोक्तियों के विचलन आदि का अध्ययन भी किया जाता है। इस प्रकार भाषाविज्ञान के आधार पर कृतिकार की भाषा का विश्लेषण अत्यंत गहराई के साथ किया जाता है।

  

शैली की परिभाषा

संस्कृत के विद्वानों ने शैली की स्वतंत्र रूप से कोई व्याख्या नहीं की है किंतु भाषाअलंकारशब्द-शक्ति , वक्रोक्तिरीतिछंदगुणदोष आदि का तो विस्तार से विवेचन किया हैपर शैली के विषय में वे मौन रहे है। उनकी दृष्टि में शैली प्रतिभा के अंतर्गत ही है। शैली को आधार बनाकर पाश्चात्य विद्वानों ने इस पर काफी विचार किया है और  लिखा है।

प्रमुख पाश्चात्य विद्वानों की शैली परिभाषाऐं प्रस्तुत है-

1.            प्लेटो - जब विचार को रूप दिया जाता है,तभी शैली का जन्म होता है।

2.            डॅा.  जन्सन    हर व्यक्ति एक विशिष्ट शैली को अपनाता है।

3.                गेटवे किसी भी कृतिकार की शैली उसके मस्तिष्क की विश्वसनीय प्रतिलिपि होती है।

4.                चेस्टर फील्ड - विचारों के परिधान को शैली कहते है।

5.                एलिस -    स्वयं विचार ही शैली है।

6.                बूर्फो -   विचार - क्रम तथा विचार-गति को शैली कहते है।

7.                प्राउस्ट-  शैली एक तकनीक का प्रश्न नहींअतितु यह दृष्टि का प्रश्न है।

8.                स्वेन-   शैली भाषा और विचार दोनों में ही विद्यमान रहती है।

9.               शेरन -  किसी भी कलात्मक अभिव्यक्ति में व्यक्तिव की विद्यमानता को शैली कहते है।

10.             मरी -  भाषा के उस वैशिष्टय को शैली कहते हैजो भावों और विचारों को उचित ढंग     

                           से प्रेषित करता है।

 

प्रमुख हिन्दी विद्वानों की शैली परिभाषाऐं प्रस्तुत है-

1.         डॅा.  श्यामसुन्दर दास - किसी कवि या लेखक की शब्द - योजनावाक्यांशों का प्रयोग वाक्यों की बनावट और उनकी ध्वनि आदि का ही शैली है।

2.         डॅा  गुलाबराय - शैली शब्द के दो - तीन अर्थ हैएक तो वह अर्थ हैजिसमें कि यह कहा जाता है कि शैली ही मनुष्य है वहां  इस अर्थ में शैलीअभिव्यक्ति का वैयक्तिक प्रकार है। दूसरे अर्थ में शैली अभिव्यक्ति के सामान्य प्रकारों को कहते है। भारतीय समीक्षाशास्त्र की रीतियां इसी अर्थ में शैलियां  है । तीसरे अर्थ में शैली , वर्णन की उत्तमता को कहते हैं,  जब हम किसी रचना के सम्बन्ध में कहते हैं - यह है शैली या किसी की अलोचना करते हुए कहते हैं कि यह क्या शैली हैवे क्या जानें कि शैली क्या है ?तब हम इसको इसी अर्थ में प्रयुक्त करते हैं। शैली में न तो इतना निजीपन हो कि वह सनक की हद तक पहुच जाये और न इतनी सामान्यता हों कि वह नीरस और निजींव हो जाये। शैली अभिव्यक्ति के कुछ गुणों को कहते हैंजिन्हें लेखक का कवि अपने मन के प्रभाव  को समान रूप में दूसरों तक पहुचाने के लिए अपनाता है।

3.         रामदहिन मिश्र - किसी वर्णनीय विषय के स्वरूप को खडा़ करने के लिए उपयुक्त शब्दों के चुनाव और उनकी योजना को शैली कहते हैं ।

4.         आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने भावों को प्रधानता दी है किंतु उन्होंने बिना शैली के किसी रचना को उत्तम कोटि का नहीं माना है। वस्तुतः शुक्ल जी ने शैली को विशेष रूप् से ही देखा है उनके अनुसार समय के अनुरूप् अपने उदात्त विचारों को इस प्रकार प्रस्तुत करना कि जो वह कहना चाहता है वह दूसरों तक पहुंच जाये अर्थात् विचारों का प्रभावी यथार्थ रूप् में दूसरों तक पहुंचाना ही शैली है।

5.         डॅा.नगेन्द्र - साहित्य एवं साहित्यशास्त्र की प्रायः दृष्टि से शैली के तीन अर्थ होते हैं

)        शैली कृतिकार के व्यक्तित्व के वैशिष्ट्य का सहज गुण है।

)        शैली विषय प्रतिपादन की प्रविधि हैऔर

)         शैली कलात्मक अभिव्यक्ति है इस प्रकार यह साहित्य की चरम उपलब्धि है।

 

 

शैलीविज्ञान की उपादेयता

शैली का साहित्य निर्माण में अपरिहार्य योगदान है। साहित्य किसी विषय पर लेखन ही नहीं है। प्रायः संसार में किसी भी विषय को एक व्यक्ति द्वारा ही नहीं समझा जा सकता है। कई बार हर विषय पर अलग अलग लोगों द्वारा अलग अलग दृष्टिकोण से ही उसे ठीक तरह से समझा जा सकता है। साहित्य यही कार्य करता है और विभिन्न रचनाकार ही अपने मत द्वारा सही प्रस्तुतीकरण कर सकते हैं।  रचनाकार का अनुभव ही सही दृष्टि रख सकता है। क्या किसानों का यथार्थ चित्रण प्रेमचंद्र जैसा कोई कर सकता हैक्या राम जैसे मर्यादा पुरूषोत्तम का दर्शन तुलसी के अतिरिक्त करा सकता हैक्या विचारों का ऐसा संगुंफन डॅारामचंद्र शुक्ल के अतिरिक्त कोई कर सकता हैअर्थात् मानव मन के असीम भावों को एक रचनाकार नहीं समा सकता है अतः यह विविधता शैली के द्वारा ही आ सकती है। शैलीविज्ञान इन्हीं विविधताओं का अध्ययन सैद्धान्तिक रूप से करते है।

शैली काव्य या रचना की सबसे बड़ी प्रेरणा है। प्रायः साहित्यकार किसी भाव के प्रति उसकी क्या सोच है यह दर्शाने के लिये ही वह रचना करने को प्रेरित होता है उसे अपने ही अंदाज में नये तरीके से प्रस्तुत करता है। हर घटना का परिणाम उसके अनुसार क्या होना चाहिये वह अपनी शैली में ही प्रस्तुत करता है। इस प्रेरणा के कारण ही साहित्य का असीम विस्तार हो जाता है और फिर भी उसके नवीन विस्तार के लिये गुंजाइश बनी रहती है। न सिर्फ साहित्य वल्कि भाषा के विस्तार में भी शैली का अहम योगदान होता है क्योंकि कलापक्ष या भाषा ही उस भाव को प्रस्तुत करती है। भाव तो सभी में ऐक जैसे ही विद्यमान रहते हैं किंतु उनका साहित्य में प्रस्तुतीकरण भिन्न भिन्न होता है और उसको प्रस्तुत करने के लिये वह नये तरीके अपनाता है जिसके लिये वह भाषा में नये प्रयोग भी करता है और उसे विचित्र तरीके से परिवर्तित भी करता है। इस प्रयास में भाषा के भंडार का भी विस्तार हो जाता है। शैलीविज्ञान साहित्य की प्रेरणा, विस्तार तथा मौलिकता एवं भाषा के प्रयोग, परिवर्तन, भंडार आदि के ऊपर विस्तार से विश्लेषण करता है।

 

उपरोक्त सभी परिस्थितियों में शैलीविज्ञान का विशिष्ट स्थान होता है। अतः कहा जा सकता है कि साहित्य भाषा और ज्ञान के क्षेत्र में शैलीविज्ञान का अपरिहार्य स्थान है।

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